रविवार, 19 फ़रवरी 2012

कृषि बदहाल वर्ल्ड बैंक जिम्मेदार-देवेन्द्र शर्मा


Agriculture

अभी कुछ दिनों पहले की बात है, दुनिया भर के अकादमिक और विशेषज्ञों के साथ वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष रॉबर्ट एलिक वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए जुड़े हुए थे। इस वीडियो कांफ्रेंसिंग में मैं भी शामिल था। मैंने भारत का पक्ष रखते हुए वहां कहा यह जो सारा खाद्यान्न संकट है, इसके लिए वर्ल्ड बैंक की नीतियां जिम्मेदार है। मेरी बात सुनकर वहां खलबली सी मच गई

मैंने कहा आप इस संकट को दूर नहीं करना चाहते। आप पूरी दुनिया के विकासशील देशों को बेवकूफ बना रहे हैं। पिछले 40 साल की जो तमाम कृषि नीतियां हैं, विकासशील देशों की खेती को बढ़ाने के लिए नहीं है, बल्कि कृषि को खत्म करने और किसानों को तबाह करने वाली हैं। अब सोच यह है कि विकसित देश तो अपनी खेती को जमकर बढ़ाएं और विकासशील देशों की खेती नष्ट हो, किसान तबाह हो। जिससे वे खाद्यान्न के लिए बड़े देशों के सामने कटोरा लेकर खड़े हों।

विकासशील देशों के लिए डब्ल्यूटीओ भी एक साजिश ही है। हम लगातार खाद्यान्न आयात कर रहे हैं। इससे हमारी आत्मनिर्भरता तबाह हुई है। हम जब भी बाहर से खाद्यान्न आयात कर रहे होते हैं, हम सिर्फ खाद्यान्न आयात नहीं करते बल्कि बेरोजगारी भी साथ-साथ आयात करते हैं। ‘मिलेनियम डेवलपमेंट गोल’ में जो तय किया गया है, इससे बड़ा छल कोई नहीं है।

इसका कोई मतलब नहीं है। अफ्रीका की हालत से आप परिचित हैं। आज हम भी उसकी राह पर हैं। आज वह नीतियां फिर से लागू की जा रही हैं, जो तीस के दशक में बंगाल में भूखमरी के समय में लागू थी। उस वक्त भी लोगों ने निजी तौर पर काफी अनाज का भंडारण किया था। यह भूखमरी की मुख्य वजह थी। आज भी देश में अनाज का उत्पादन कम नहीं है बल्कि अनाज दबाकर रखे जाने की वजह से हमें अनाज का आयात करना होता है।

इस सरकार ने निर्णय लिया कि निजी कंपनियां गांव में नहीं जाएंगी। जिससे हालात में काफी सुधार दिखा, लेकिन यह सब सिर्फ चुनाव की वजह से है। यदि वह वास्तव में किसानों के लिए सोचती तो सबसे पहले एपीएमसी एक्ट में नीतिगत सुधार करती। दूसरी बात बंगाल में भूखमरी के समय भी वायदा बाजार था। आज भी यह बर्बादी की एक बड़ी वजह बना हुआ है।

इस वक्त वायदा बाजार के माध्यम से सालाना लेन-देन तकरीबन 40 लाख करोड़ का है। इसके साथ डिब्बा बाजार के नाम से एक धोखा बाजार भी है। एक अनुमान के अनुसार उसका कारोबार भी 40 लाख करोड़ का ही है। अब जरा वायदा बाजार के लिए गठित अभिजीत सेन कमिटी को याद कीजिए। जिसने वायदा बाजार के पक्ष में अपनी रिपोर्ट दी। आपको याद होगा कि इस कमिटी में में कौन से लोग थे तो आप सहज ही समझ जाएंगे कि वे सभी तो वायदा बाजार वाले ही थे।

आप अगर ‘यूनाइटेड स्पेशल रिपोर्टियर राइट टू फूड’ की रिपोर्ट देखें तो पाएंगे कि वह बढ़ती महंगाई के लिए वायदा बाजार को एक प्रमुख कारण गिनता है। अब देखिए ग्वार सीड का उत्पादन पूरे देश में 1600 लाख टन होता है और 1692 लाख टन का इसका वायदा व्यापार है। अब अतिरिक्त 92 लाख टन ग्वार सीड कहां से आता है, यह किसी की चिन्ता में शामिल नहीं है। इसी तरह मेंथा का उत्पादन 100 करोड़ रुपए का है और व्यापार 1000 करोड़ रुपए का। कहना न होगा कि आज सारा बाजार ‘कॉरपोरेट कंट्रोल’ में है।

दुनिया चाहती है कि हम अपने कृषि को बाहर वालों के लिए खोल दें। यह बेहद खतरनाक है। हमें इससे बचना होगा। इसके लिए हमें कृषि को टिकाऊ और आर्थिक तौर पर सक्षम बनाना होगा। यह जरूरी है कि हम अपने 60 करोड़ किसानों के लिए कुछ ऐसा करें कि वे खेती कर सकें। उनका खेत छोड़ना देश हित में नहीं है। हमें डब्ल्यूटीओ के मुक्त बाजार वाले एग्रीमेंट से खुद को बचाना होगा। इस एग्रीमेंट को मानने का सीधा सा मतलब है कि हम निगल लिए जाएंगे। दुनिया के एक चौथाई किसान भारत में हैं। यहां जो उत्पादक है, वह उपभोक्ता भी है।

मैं किसानों के लिए उनकी आमदनी से जुड़े एक आयोग बनाने के पक्ष में हूं। जो किसानों को जमीन के हिसाब से एक निश्चित रकम प्रति माह अदा करे। सरकार यदि कहती है कि उसके पास पैसों का अभाव है तो यह बात मैं मानने को तैयार नहीं हूं। बहुत पैसा है सरकार के पास। जिस तरह छठे वेतन आयोग से सरकारी कर्मचारियों को फायदा मिला, उसी तरह की कोई व्यवस्था किसानों के लिए भी होनी चाहिए।

नेशनल सैंपल सर्वे का 2004 का अध्ययन बताता है कि प्रति किसान परिवार की मासिक आय 2115 रुपए थी, जो गरीबी रेखा के नीचे है। मैं यदि प्रधानमंत्री होता तो किसानों के प्रति परिवार के लिए एक चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी के बराबर रकम देने की व्यवस्था अपनी (सरकार की) तरफ से करता। अब सोचिए यदि कोई सरकार यह काम कर दे तो जिस देश में 60 करोड़ के आस-पास किसान हैं, वहां कौन सी पार्टी उसे चुनाव में हरा पाएगी? सबसे तकलीफ की बात यह है कि कोई सरकार यह करना ही नहीं चाहती