शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

खाद संकटः भंवर में फंसा किसान- नरेश सिरोही



हमारे खेतों में पोषक तत्वों की मात्रा तेजी से घट रही है, जिसका कारण 70 के दशक में शुरू की गई गहन कृषि है, जो शायद तब जरूरी भी थी और इसलिए हमारी खेती आज लगभग पूरी तरह रसायनिक खाद पर निर्भर है।

हाल में खबर आई कि दुनिया में सात अरबवां बच्चा पैदा हो गया है। कई देशों में इस सात अरबवें बच्चे का श्रेय लेने की होड़ मची और इसमें भारत भी पीछे नहीं था। हालांकि कुछ लोगों ने इन सात अरब लोगों के पेट भरने पर भी चिंता जाहिर की, लेकिन खाद्य उत्पादन कैसे बढ़ेगा इस पर कोई ठोस बात सामने नहीं आई।

अब हमारे देश में खेती का क्या हाल है, आइए इस पर नजर डाल लें। हमारे देश में कुल 19.5 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर खेती की जाती है। इसमें करीब 83 फीसदी छोटे और सीमांत किसान हैं यानी दो हेक्टेयर से भी कम जोत वाले। भारत का आधे से ज्यादा श्रमबल खेती में लगा है और अन्य क्षेत्र की वृद्धि और हमारी पूरी अर्थव्यवस्था भी काफी हद तक खेती के प्रदर्शन पर निर्भर है। लेकिन अच्छे उत्पादन के लिए किसानों को सही समय और सही मात्रा में उर्वरक यानी खाद उपलब्ध कराना बेहद आवश्यक है। लेकिन कई राज्यों में बुआई शुरू हो जाने के बावजूद पोटाश, डीएपी यानी डायअमोनियम फास्फेट और नाइट्रोजन यानी यूरिया की किल्लत बरकरार है।

बेहतर होता कि किसान को खाद के लिए बाहरी स्रोतों पर निर्भर न होना पड़ता। जैविक स्रोतों से अगर वह अपने खेतों के लिए खाद बना लेता तो एक ओर जहां उसके कृषि उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ती, वहीं उसकी लागत भी कम हो जाती, जिसका सकारात्मक असर सीधे उसकी आय पर पड़ता। लेकिन सभी सरकारों ने उसे रासायनिक खाद का अभ्यस्त बना दिया।

देश में रासायनिक खाद बनाने के करीब 141 संयंत्र हैं और करीब 1 करोड़ 67 लाख टन सामग्री आयात की जाती है। देश में रासायनिक खाद की खपत करीब पांच करोड़ 33 लाख टन है और उत्पादन 3 करोड़ 72 लाख टन है। यानी बाहर से मंगवाना हमारी मजबूरी है। हमारे खेतों की मिट्टी में करीब 89 फीसदी नाइट्रोजन की कमी है, फास्फोरस करीब 80 फीसदी तक कम है, पोटैशियम 50 फीसदी सैंपलों में कम पाया गया है, सल्फर लगभग 40 फीसदी कम है, जस्ते की कमी करीब 48 फीसदी है, बोरान 33 फीसदी कम, लौह तत्व लगभग 12 फीसदी कम है और मैग्नीज करीब 5 फीसदी कम है।

ऊपर दिये गये आंकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे खेतों में पोषक तत्वों की मात्रा तेजी से घट रही है, जिसका कारण 70 के दशक में शुरू की गई गहन कृषि है, जो शायद तब जरूरी भी थी और इसलिए हमारी खेती आज लगभग पूरी तरह रसायनिक खाद पर निर्भर है।

केन्द्र सरकार ने रसायनिक खाद के लिए नई नीतियां बनाई हैं, लेकिन कोई भी नीति किसान को लाभ देने में नाकामयाब रही है। सरकार रसायनिक खाद पर से सब्सिडी हटाती है तो कंपनियां दाम बढ़ा देती हैं। पोषक तत्वों पर आधारित सब्सिडी दी जाती है, इसे एनबीएस कहते हैं यानी न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी। यह एनबीएस डाइअमोनियम फास्फेट यानी डीएपी, म्यूरेट आफ पोटाश यानी मओपी, मोनोअमोनियम फास्फेट यानी एमएपी, ट्रिपल सुपर फास्फेट यानी टीएसपी, सिंगल सुपर फास्फेट यानी एसएसपी और 13 अन्य रसायनिक खादों पर लागू है। हालांकि यह सब्सिडी भी उद्योग के जरिए ही दी जाएगी। नाइट्रोजन पर प्रति किलोग्राम 27.48 रुपये एनबीएस दी जाती है, फास्फोरस पर 29.40 रुपये सब्सिडी, पोटेशियम पर 24.62 रुपये और सल्फर पर 1.69 रुपये प्रति किलोग्राम सब्सिडी दी जाती है। यूरिया के दाम सरकार तय करती है जबकि बाकियों के दाम कारोबारी तय करते हैं।

भारत यूरिया और डीएपी का सबसे बड़ा आयातक है और पोटाश यानी म्यूरेट आफ पोटाश एमओपी का दुनिया में दूसरे नंबर का आयातक है। हाल ही में अमेरिका की एक फर्म दी मिनिसोटा ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में फास्फेट आधारित रसायनिक खाद की खपत में पांच फीसदी की वृद्धि होगी। रिपोर्ट के अनुसार अनाज से लेकर तिलहनी फसलों, फलों, सब्जियों एवं अन्य कृषि उत्पादों के दाम काफी ऊंचे स्तर पर हैं, जिस कारण दुनियाभर के किसान अधिक से अधिक कृषि उत्पादन में लगे हैं और इसी कारण रसायनिक खाद की खपत बढ़ रही है।

वैश्विक स्तर पर ही रसायनिक खाद की समस्या बनी हुई है और ऐसे में एनबीसी के बहाने सब्सिडी में कमी होने के कारण रसायनिक खाद उद्योग अपनी नुकसान की बात करके दाम बढ़ाने पर तुला है। इस कारण कई कंपनियों ने अपने प्राइस कंट्रोल के बाहर वाली रसायनिक खाद के दाम बढ़ा दिए हैं। यानी एनबीसी से किसानों को लाभ कम नुकसान अधिक हो रहा है।

मौजूदा समय में सबसे बड़ी किल्लत डीएपी की है। एमओपी की भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमी बनी हुई है। राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में रसायनिक खाद राज्य मंत्री श्रीकांत कुमार जेना ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में एमओपी की उपलब्धता कम है।

मौजूदा रबी सीजन के दौरान फास्फेट उर्वरकों जैसे डीएपी की किल्लत से किसानों को दो-चार होना पड़ रहा है। उर्वरक मंत्रालय के अनुसार रबी सीजन के लिए 20 लाख टन उर्वरक स्टाक के तौर पर रखा गया था, लेकिन उसे खरीफ सीजन के दौरान ही किसानों को उपलब्ध करा दिया गया था, जिससे आपूर्ति कम पड़ रही है। मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि डीएपी की किल्लत को एसएसपी के द्वारा पूरा करने की कोशिश की जा रही है। अधिकारिक आंकड़ों के अनुसार बीते वर्ष के 32.19 लाख टन के मुकाबले चालू रबी सीजन में 30 लाख टन डीएपी ही उपलब्ध है। इसी अवधि में यूरिया की मांग और आपूर्ति के बीच 12-13 लाख टन का अंतर है।

अब यह तो सब जानते ही हैं कि जब भी भारत में नया बुआई सीजन चालू होता है, तभी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में रसायनिक खाद के दाम बढ़ जाते हैं और जहां भारत कृषि उत्पादों की खरीद की बात करता है तो भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कृषि उत्पादों के दाम आसमान छूने लगते हैं। अब सवाल यह उठता है कि सरकार की नीति इन अंतरराष्ट्रीय बाजारों के उतार-चढ़ावों से निपटने के लिए क्या रही है? किसानों को सरकार सही रसायनिक खाद, सही बीज, सही कीटनाशक और सस्ते कृषि उपकरण इस्तेमाल करने के लिए हमेशा प्रेरित करती रहती है, लेकिन उनकी उपलब्धता को लेकर उसके पास कोई ठोस योजना नहीं है। सरकार की हर नीति उद्योगों के लाभ को ध्यान में रखकर ही बनाई जाती है।

पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश से लेकर लगभग सभी राज्यों में रसायनिक खाद की किल्लत बरकरार है। हालांकि तापमान अधिक होने के कारण किसान वैसे ही गेहूं और अन्य रबी की फसलों की बुआई देरी से शुरू कर रहा है, फिर भी उसे रसायनिक खाद सही मात्रा और सही समय में नहीं मिल पा रही है। इससे उत्पादन में तो फर्क पड़ेगा ही, साथ ही साथ किसान की आमदनी भी घटेगी, क्योंकि कालाबाजारी धड़ल्ले से जारी है। इससे कई तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं।

पहले से ही बदहाल किसानों को बगैर कोई विकल्प दिए, खाद से सब्सिडी हटा लेना कहां की किसान हितैषी नीति है? किसान को कर्ज के मौजूदा दलदल से निकालने के लिए सरकार के पास कोई कारगर उपाय नहीं हैं। रसायनिक खाद के दाम बेतहाशा बढ़ रहे हैं और किसान को उसकी उपज के उचित दाम नहीं मिल रहे हैं, ऐसे में किसान की हालत बद से बदतर होती जा रही है। जो लोग किसानों को जैविक खेती की ओर मोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, उन्हें अपने प्रयासों में और तेजी लानी होगी। किसान को यदि रसायनिक खाद का व्यवहारिक विकल्प मिलेगा तो उसे वह जरूर अपनाएगा