शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

प्रस्तावित बीज विधेयक से बात नहीं बनेगी - भारतीय पक्ष ब्यूरो



एक कहावत है कि जिसका बीजों पर नियंत्रण है, उसका कृषि पर नियंत्रण होगा, जिसका कृषि पर नियंत्रण होगा, उसका खाद्य सुरक्षा पर नियंत्रण होगा। इसलिए बीजों से संबंधित कोई कानून बनाने के पहले राष्ट्रीय हित से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

पारंपरिक रूप से भारत का किसान अपने बीजों की व्यवस्था खुद कर लेता था। उसे कहीं से बीज खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती थी। लेकिन बदले माहौल में बेहतर उत्पादन के लिए बेहतर बीज की उसे जरूरत महसूस होती है। आदर्श स्थिति तो यह होती कि सरकारी संस्थान और कृषि विश्वविद्यालय किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराते। लेकिन वे अपना काम ठीक ढंग से नहीं कर सके। अब सरकार चाहती है कि यह काम देशी-विदेशी बीज कंपनियां करें। विदेशी बीज कंपनियों की नजर भारतीय बीज बाजार पर है। देशी बीज कंपनियां उनके सामने कहीं नहीं टिकतीं। प्रस्तावित बीज विधेयक, 2010 के माध्यम से सरकार इन कंपनियों को किसानों को बीज बेचने की अनुमति दे रही है। एक कहावत है कि जिसका बीजों पर नियंत्रण है, उसका कृषि पर नियंत्रण होगा, जिसका कृषि पर नियंत्रण होगा, उसका खाद्य सुरक्षा पर नियंत्रण होगा। इसलिए बीजों से संबंधित कोई कानून बनाने के पहले राष्ट्रीय हित से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। देश और किसानों के हित को ध्यान में रखते हुए प्रस्तावित बीज विधेयक में निम्न बातों के बारे में भी समुचित रूप से प्रावधान किया जाना चाहिए।

पारंपरिक देशी बीजों के संरक्षण की व्यवस्था हो

प्रस्तावित कानून बीजों के व्यवसायिक कारोबार के बारे में है। लेकिन यह एक सच्चाई है कि आज भी 80 प्रतिशत किसान अपने ही बीजों का इस्तेमाल करते हैं। आज की तारीख में भारत में बीजों का व्यवसाय केवल 1 अरब डालर का है। लेकिन बीज कंपनियां अधिक से अधिक किसानों को कंपनी का बीज खरीदने के लिए माहौल बनाएंगी, ताकि उनका कारोबार तेजी से बढ़ सके। प्रस्तावित कानून पारंपरिक बीजों के संरक्षण के बारे में मौन है। यदि सरकार सचमुच किसानों का हित चाहती है तो उसे चाहिए कि वह कानूनी प्रावधान के द्वारा ब्लाक स्तर पर बीज बैंकों की स्थापना करे, जहां पारंपरिक किस्मों के संरक्षण की व्यवस्था हो। सरकार का उद्देश्य होना चाहिए कि किसानों की बीज कंपनियों पर निर्भरता कम से कम हो। जबर्दस्त मार्केटिंग के कारण कई बार व्यवसायिक बीज कंपनियां ऐसे बीजों को भी बेच लेती हैं, जिनकी अच्छी किस्में पारंपरिक रूप से नि:शुल्क उपलब्ध हैं। बंगाल में सुंदरबन इलाके में धान की ऐसी किस्में हैं जो खारे पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं। लेकिन कई बीज कंपनियां ऐसे धान के बीज बनाने के लिए शोध कर रही हैं जो खारे पानी में पैदा हो। जब वे इसे बना लेंगी तो अपनी मार्केटिंग के बल पर वे उसे सुंदरबन के किसानों में भी बेंच लेंगी। ऐसी विसंगति न होने पाए, इसके लिए प्रस्तावित विधेयक में प्रावधान किया जाना चाहिए।

बीजों के मूल्य पर सरकारी निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था होनी चाहिए

प्रस्तावित कानून में बीजों के मूल्य नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं है। आज टमाटर का एक किलो बीज 75,000 रुपए में बिकता है। बीजों की कीमत अधिक होने से किसान की लागत बढ़ जाती है, जिससे खेती उसके लिए मुश्किल होती जाती है। बीटी काटन के बीजों की कीमत जिस तेजी से बढ़ी, उस तेजी से उसका उत्पादन नहीं बढ़ा। नतीजा किसानों की आत्महत्या के रूप में प्राय: हमारे सामने आता रहता है। हाल ही में जब आंध्र प्रदेश सरकार ने बीजों की कीमत और रायल्टी पर नियंत्रण करना चाहा तो संबंधित बहुराष्ट्रीय बीज कंपनी उच्च न्यायालय में चली गई। इस मुकद्दमेबाजी से यह साबित हो गया कि बीज कंपनियों को खुला नहीं छोड़ा जा सकता। इसलिए प्रस्तावित बीज विधेयक की धारा 5 में सुधार कर केन्द्रीय बीज समिति को यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि वह बीजों की कीमत पर अंकुश रख सके। ऐसा नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं, जब अत्याधिक महंगे बीजों को किसानों के लिए सुलभ करने के लिए सरकार को सब्सिडी देनी पड़ेगी।

बीज कंपनियों की समुचित जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए

विदर्भ में कई बार ऐसा हुआ है, जब कंपनियों के बीज नकली निकल गए। अपनी फसल बोने में किसान महंगे बीज के साथ और भी कई खर्च करता है। अगर बीज नकली निकल गए तो उसका पूरा निवेश डूब जाता है। किसी भी किसान के लिए इसका झटका बहुत गहरा होता है। कई बार वह इसके बाद आत्महत्या की हद तक चला जाता है। प्रस्तावित बीज विधेयक में बीज कंपनियों की जिम्मेदारी बहुत हल्की रखी गई है। यदि कोई कंपनी बीज की शुध्दता और अंकुरण से जुड़े जरूरी रिकार्ड नहीं रखती है, तो उस पर एक लाख का जुर्माना लगाए जाने की बात कही गई है। नकली बीज बेचने पर 1 साल की सजा के साथ 5 लाख जुर्माने का प्रावधान है। करोड़ों-अरबों की टर्नओवर वाली बीज कंपनियों के लिए जुर्माने की यह राशि न के बराबर है। इसलिए जरूरी है कि प्रस्तावित विधेयक में नकली बीज बेचने वाली कंपनी को किसान को समुचित जुर्माना देने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। जुर्माने की राशि का निर्धारण बीज कंपनी के टर्नओवर और किसान को हुए नुक्सान के आधार पर किया जाना चाहिए। आर्थिक जुर्माने के साथ संबंधित कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने और उसके अधिकारियों को जेल भेजने का प्रावधान भी होना चाहिए, क्योंकि नकली बीज बेचकर वह न केवल देश की खाद्य सुरक्षा से खिलवाड़ करती है, बल्कि किसानों को बर्बाद कर समाज में अराजकता फैलाने का खतरा भी पैदा करती है।

एकाधिकार की समयावधि कम की जाए

मौजूदा कानून के मुताबिक बीज का रजिस्ट्रेशन होने के बाद आम फसलों के मामले में 15 साल और पेड़ों के मामले में 18 साल तक बीज पर संबंधित बीज कंपनी का अधिकार रहता है। अब इसे बढ़ाकर क्रमश: 30 और 36 साल किया जा रहा है। जाहिर है कि इससे बीज बाजार में एकाधिकार कायम होगा और निजी बीज कंपनियां इसका फायदा अधिक से अधिक लाभ कमाने के लिए उठाएंगी। देश हित में जरूरी है कि प्रस्तावित बीज विधेयक में पंजीकृत बीज पर कंपनी के अधिकार की अवधि को कम से कम रखा जाए।

बीज की बिक्री की अनुमति देने का अधिकार राज्यों को मिले

भारत में विभिन्न राज्यों की भौगोलिक एवं पर्यावरणीय स्थिति भिन्न-भिन्न है। इसलिए कोई बीज संबंधित राज्य में बिक्री के लिए उपलब्ध होना चाहिए या नहीं, यह निर्णय लेने का अधिकार संबंधित राज्य सरकार को ही होना चाहिए। प्रस्तावित विधेयक में इस मुद्दे पर स्पष्टता नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह राज्य सरकारों के अधिकार को लेकर कोई भ्रम की स्थिति नहीं रहने दे।

आयातित बीजों की गुणवत्ता पर कड़ी निगरानी रखी जाए

विदेशी बीज कंपनियां धड़ल्ले से बीजों को बाहर से मंगाती हैं। कई बार इन बीजों की गुणवत्ता की समुचित जांच न होने से उनके माध्यम से कई प्रकार की बीमारियां और कीट-पतंगें भी हमारी धरती पर आ जाते हैं। आयातित बीजों के न केवल इस खतरे को ध्यान में रखते हुए जांच होनी चाहिए, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि भारतीय माहौल में आयातित बीज कितने अनुकूल साबित होंगे। स्व-प्रमाणन या विदेशी एजेंसियों द्वारा दिए गए प्रमाण को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह मामला हमारी आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। यदि किसी बीज के साथ हानिकारक कीट-पतंगें या किसी बीमारी के आने की बात साबित हो तो संबंधित आयातक और निर्यातक दोनों को दंडित करने की व्यवस्था की जानी चााहिए।

पारंपरिक बीजों की जेनेटिक चोरी रोकने के लिए कड़े उपाय हों

बीज विधेयक, 2010 में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जब कोई कंपनी किसी बीज के पंजीकरण के लिए आवेदन करे तो उससे यह विस्तार से पूछा जाना चाहिए कि उसने बीज की किस मूल किस्म से उसे विकसित किया है। इस बात का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए कि जो बीज हमारे किसानों ने वर्षों की मेहनत से तैयार किया है, उसका व्यवसायिक लाभ कोई कंपनी न उठाने पाए।

जीन परिवर्तित बीजों को प्रस्तावित विधेयक से बाहर रखा जाए

जीन परिवर्तित बीजों के बारे में भारी विवाद है। ऐसे बीजों को अभी प्रस्तावित विधेयक की परिधि से बाहर ही रखा जाना चाहिए, क्योंकि उनकी मंजूरी के लिए एक अलग ही प्रक्रिया है। अगर उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए नया बीज अधिनियम अस्तित्व में आता है, तभी हमारे देश की खेती-किसानी को लाभ मिल पाएगा