रविवार, 19 फ़रवरी 2012

किसान हैं तो मत रोइए गरीबी का रोना-रूपेश पांडेय



जगजीवन राम राष्ट्रीय पुरूस्कार से सम्मानित राम सरन वर्मा ने अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति से यह सिद्ध कर दिया है कि मेहनत हमेशा रंग लाती है। आईए पढ़ते है इनकी कहानी…

देश भर के किसान सरकार पर सहायता के लिए टकटकी लगाए रहते हैं, लेकिन बाराबंकी के किसान राम सरन वर्मा को सरकारी मदद की कोई जरूरत नहीं है। वे सरकारी राहत की ओर निहारने वाले नहीं बल्कि करोड़पति किसान हैं। उनके पास नुस्खा है, आपदाओं से जूझने का और खेती से करोड़पति बनकर सम्मान पूर्वक जीने का। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हाईटेक कृषि फार्म के मालिक राम सरन वर्मा दसवीं फेल हैं।

राम सरन जी कहते हैं, ‘‘किसान हैं तो गरीबी का रोना मत रोइए, मेरे पास आइए। मैं बताऊंगा खेती से करोड़पति बनने का नुस्खा!’’ उनके हाईटेक कृषि फार्म पर केवल बाराबंकी या उत्तर प्रदेश के ही नहीं बल्कि पूरे देश से आकर हजारों किसान प्रशिक्षण लेकर लाभान्वित हो चुके है। परंपरागत खेती से जरा हटकर फसल चक्र में परिवर्तन कर राम सरन वर्मा न केवल खुद करोड़पति बने हैं, बल्कि वे गांव के सैकड़ों खेत मजदूरों को भी रोजगार दे रहे हैं। उनके खेतों में काम करने वालों को रोजगार गारंटी योजना से ज्यादा मजदूरी मिलती है। वह भी केवल 100 दिन नहीं, पूरे साल भर।

जगजीवन राम राष्ट्रीय फरस्कार से सम्मानित राम सरन वर्मा बताते हैं, ‘‘1995 से पहले खेती से मेरी 20-25 हजार रूपए सालाना कमाई होती थी। मेरे मन में जिज्ञासा थी कुछ नया करने की, इसलिए देश भर में घूमा। मेरी निजी खेती 6 एकड़ है। मैंने 1995 से स्ययं की विकसित तकनीक से एक एकड़ खेत में केला व टमाटर की खेती शुरू की। अब हालात बदल गए हैं। 14-15 वर्षों में ही मैं प्रदेश का एक आदर्श किसान बन गया हूं। आज मैं लगभग 85 एकड़ खेत किराए पर लेकर खेती करता हूं। जिसका किराया 12-16 हजार रूपए प्रति एकड़ प्रति वर्ष है। इस सहकारिता खेती का लाभ पूरे गांव को मिल रहा है।’

क्या है वर्मा की खेती का नुस्खा? ‘वर्मा कहते हैं कि ज्यादा खाद डालकर अधिक फसल पैदा करने की किसानों की सोच गलत है। जमीन को समय और जरूरत के हिसाब से खाद, पानी और आराम देंगे तो ज्यादा लाभ मिलेगा। लम्बे समय तक खेती करनी है और लाभ कमाना है तो खेत को गोबर के खाद की जरूरत होगी। खेत को खाली भी छोड़ना पड़ता है। 5-6 वर्ष पहले वर्मा जिले में केले की खेती करने वाले अकेले किसान थे। अब जनपद में 500 हेक्टेयर से ज्यादा खेतो पर केले की खेती हो रही है। पहले बाराबंकी जिला मेन्था की खेती के लिए प्रसिद्ध था। अब यहां आलू, टमाटर की अच्छी खेती हो रही है।

वर्मा के खेत पर हर रोज प्रशिक्षण लेने वाले किसानों का जमावड़ा लगा रहता है। सिद्धौर से आए श्रीकृष्ण वर्मा बताते हैं, ‘अध्यापन सेवा से मुक्त होने के बाद एक दिन इधर से गुजरते हुए राम सरन वर्मा से मुलाकात हुई। इन्होंने टमाटर की खेती करने की सलाह दी। एक पैकेट बीज भी दिया। पहले साल चैथाई एकड़ में मैंने टमाटर लगाया। मुझे 32 हजार का शुद्ध लाभ हुआ।’ गन्ना पैदा करने वाले तराई इलाके में अब सब जगह टमाटर की खेती दिखने लगी है। सीताफर के तंभौर कस्बे के तीरथराज वर्मा भी प्रशिक्षण लेने आए हैं। वे कहते हैं कि राम सरन वर्मा के केलों की गुणवता भी दूसरे केलों से अच्छी होती है। केले की एक घार में 30-40 किलो केला होता है। एक एकड़ में सामान्य तौर पर 360 से 410 कुंतल केला होता है। जिनसे वर्ष में शुद्ध लाभ लगभग 1 लाख 76 हजार रूपए का हो जाता है।

प्रयोगधर्मी किसान राम सरन वर्मा इस बात के उदाहरण हैं कि थोड़ी सी समझ से किसान गरीबी के अभिशाप से मुक्त हो सकते हैं। उच्च शिक्षा के बिना भी ज्यादा सहज ढंग से खेती-किसानी की जा सकती है। आम किसान कृषि विश्वविद्यालयों से निकले वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से कहीं ज्यादा खेती का व्यवहारिक ज्ञान रखता है। उसे बस अपने ऊपर भरोसा करना सीखना होगा