कृषि स्नातक बनने के अंतिम चरण में जब जबरदस्त आत्मविश्वास से भरे कृषि छात्रों के साथ मुझे किसानों के बीच उत्तरी छत्तीसगढ़ में प्रशिक्षण लेने के लिए भेजा गया तो कृषि विज्ञान की भारी पुस्तकों को पढ़कर हम स्वयं को किसी विशेषज्ञ से कम नहीं समझ रहे थे।
पर किसानों के बीच गुजारे छह महीनों के अनुभव ने यह बात मन में गहराई से बिठा दी कि किसानों से बड़ा विशेषज्ञ कोई नहीं है। छ: महीनों के अनुभव से लगा कि हमारे साढ़े तीन वर्षों के किताबी ज्ञान काफी नहीं है। यदि इतने वर्ष हमने किसानों के सान्न्धिय में बिताए होते तो सही मायने में विशेषज्ञ बन गए होते। भले ही कृषि विज्ञान में उपलब्धियों को हम विदेशों में बढ़ा-चढ़ाकर बताएं और आपसी प्रशंसा करते रहें पर वास्तविकता यही है कि जिन किसानों के हित के लिए हमारे देश में कृषि को विज्ञान के रूप में विकसित कर कृषि विशेषज्ञों की अनावश्यक भीड़ तैयार की जा रही है, उनका नाममात्र का ही भला हो पाया है। आज आवश्यकता इस बात की है कि कृषि शिक्षा से लेकर अनुसंधान में आमूल चूल परिवर्तन किया जाए ताकि भारतीय किसानों को सही मायनों में लाभ मिल सके।
आज भले ही हमें आजाद हुए 50 वर्ष से भी अधिक हो गए हैं पर हम आज भी ब्रिटिश मानसिकता की गिरफ्त में हैं। हम किसी अनुसंधान संस्थान की पड़ताल कर लें, हमें ज्यादातर साहित्य अंग्रेजी भाषा में मिलेंगे। हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाओं में न तो शोधपत्र लिखे जाते हैं और न ही किताबें छापी जाती हैं। हमारा देश अपने संसाधन लगाकर बड़ी उम्मीद से कृषि विशेषज्ञ तैयार करता है और जब देशसेवा की बात आती है तो उनमें से अधिकांश विदेशों में नौकरी के लिए चले जाते हैं और जो रह जाते हैं, वे उस भाषा के हिमायती बन जाते हैं जिसका आम भारतीय किसान से कोई सरोकार नहीं है। यह बात समझ से परे है कि वर्तमान अवस्था में हिन्दी व क्षेत्रीय भाषाओं में शोधपत्र प्रकाशित करने वाले कृषि विशेषज्ञों को हेय दृष्टि से क्यों देखा जाता है और उन विशेषज्ञों को पदोन्नति मिल जाती है जिनके शोध पत्र विदेशी विज्ञान पत्रिकाओं में छपते हैं। यह कौन सी बात हुई कि भारत की धरती पर काम किया और उसके शोध परिणामों को दूसरे देश के वैज्ञानिकों और किसानों को बताया। आज 90 प्रतिशत से अधिक भारतीय शोध पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं पर उनकी प्रशंसा करना तो दूर उलटे उनकी राह में रोड़े अटकाये जाते हैं। अंग्रेजी का पक्ष लेने वाले यह तर्क दे सकते हैं कि अंग्रेजी दुनियाभर की भाषा है।
यदि अंग्रेजी नहीं जानेंगे, तो दूसरे देशों में हो रहे शोधों के विषय में कैसे जानेंगे? उनके लिए सीधा सा जवाब है कि आप अंग्रेजी सीखिए और उससे दूसरे देशों से ज्ञान प्राप्त करिये। पर इस भाषा का प्रयोग शोध परिणामों को अपने किसानों की बजाय बाहरी लोगों को बताने में न करें। आज भी जापान और चीन जैसे कृषिप्रधान देश हैं जिनमें शोध-परिणामों को सबसे पहले राष्ट्रभाषा में प्रकाशित किया जाता है ताकि उनके अपने किसानों का भला हो सके। कृषि से संबंधित ऐसी पत्र-पत्रिकाओं और उन अखबारों की प्रशंसा की जानी चाहिए जो कृषि संबंधी लेखों और समाचारों को किसानों तक उनकी भाषा में पहुंचाते हैं। ऐसी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन देश के विभिन्न हिस्सों से होता है। यह विडंबना ही है कि सही मायने में किसानों की सेवा कर रही संस्थाओं को किसी भी प्रकार की वित्तीय सहायता नहीं दी जाती रही हैं, वहीं दूसरी ओर विदेशों में देश का राज बताने वालो को हतोत्साहित करने की बजाय, उन्हें सम्मानित किया जा रहा है। क्या कभी ऐसा दिन भी आएगा जब अंग्रेजी भाषा में विदेशी विज्ञान पत्रिकाओं में शोध कार्य प्रकाशित करने वाले विशेषज्ञों के लिए दंड का प्रावधान होगा और उन्हें हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में लिखने के लिए बाध्य किया जाएगा?
हम किसी भी अनुसंधान संस्थान विशेषकर कृषि संबंधी अनुसंधान संस्थान में जाएंगे तो हमें दो दिशा के लोग मिलेंगे। एक का रुख विदेशों की ओर होगा और दूसरे तरह के लोगों का रुख खेतों की ओर। कई विशेषज्ञ तो वर्ष के ज्यादातर महीनों में देश के बाहर रहते हैं। विदेशी तकनीक ने वैसे ही हमारी कृषि को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। स्वदेशी तकनीक को जानने और किसानों से परामर्श कर उनमें सुधार की आवश्यकता है। आज देश को विदेशों की ओर नहीं, खेतों की ओर जाने वाले विशेषज्ञों की आवश्यकता है। यह एक कटु सत्य है कि आज हमारे अनुसंधान में खेतों की ओर जाने वाले विशेषज्ञ बहुत अच्छी दशा में नहीं हैं। इन पर दूसरा समूह हावी है। आज आवश्यकता है कि जमीन से जुड़े विशेषज्ञों को प्रोत्साहित किया जाए और सम्मानित पदों पर उनकी नियुक्ति की जाए ताकि कृषि विज्ञान और अनुसंधान को सही दिशा मिल सके।
कृषि शिक्षा में भी सुधार की आवश्यकता है। अभी छात्रों को केवल किताबी ज्ञान दिया जाता है। बताया जाता है कि कैसे अमेरिका में खेती की जाती है। इतनी सारी परिभाषाएं रटाई जाती हैं कि छात्र हलकान हो जाते हैं। लेकिन प्रायोगिक ज्ञान पर कोई जोर नहीं दिया जाता है। यही कारण है कि कृषि की तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर जब कोई छात्र व्यावहारिक क्षेत्र में आता है तो वह अपने को असहाय पाता है। उसे खेतों में जाने पर ही पता चलता है कि किसी पौधे में फूल और फल अलग-अलग भागों में नहीं उगते हैं बल्कि फूल से ही फल बनते हैं। यह बड़ी ही विचित्र बात है कि वर्तमान कृषि शिक्षा में किसान की कोई भूमिका नहीं होती। किसानों को यदि नए छात्रों से अपने अनुभव बांटने की जिम्मेदारी दे दी जाए तो कृषि शिक्षा का कायाकल्प हो जाए। शिक्षा के व्यवसायीकरण ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है। आज गली-मोहल्लों में कृषि महाविद्यालय खुलने लगे हैं। पता नहीं कृषि विशेषज्ञों की कमजोर फसल तैयार कर हमारे योजनाकार किस तरह किसानों का हित करना चाहते हैं?
आज देशभर में किसानों को ही कृषि अनुसंधान की दिशा तय करने की जिम्मेदारी देने पर विचार चल रहा है। ऐसे समय में अनुसंधान संस्थानों की वर्तमान दिशा और दशा के विषय में आम किसानों को बताना भी आवश्यक है ताकि किसानों के हित का दावा करने वाले खर-पतवार की तरह उगे अवांछनीय अनुसंधान संस्थानों पर दबाव बनाया जा सके कि वे अपनी जिम्मेदारी को सही तरीके से निभाएं। वे अपने किसानों के लिए ज्ञान जुटाएं। वे किसानों की भाषा में काम करें और काम को सरल ढंग से सामने लाएं। योजनाकारों को भी इस पुण्य कार्य में भाग लेने वाले विशेषज्ञों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि महात्मा गांधी की राह पर भारतीय किसानों को विदेशी वस्त्रों की तरह अंग्रेजी शोध पत्रिकाओं की होली नहीं जलानी पड़े